जंगलों में आग से नियंत्रित करने को वन विभाग की अच्छी पहल, जिले के 31 केंद्रों पर पिरूल की खरीद शुरू
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| DM bageshwar |
बागेश्वर जिले में वनाग्नि को नियंत्रित करने और ग्रामीणों को रोजगार प्रदान करने के उद्देश्य से वन विभाग ने पिरूल की खरीद शुरू कर दी है। इसके लिए जिले में 31 केंद्र स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों पर पिरूल की खरीद 10 रुपये प्रति किलो की दर से की जा रही है। वन विभाग का उद्देश्य पिरूल को इकट्ठा कर वनाग्नि को नियंत्रित करना और ग्रामीणों को रोजगार प्रदान करना है।
पिरूल की खरीद से ग्रामीणों को रोजगार मिलेगा और उनकी आमदनी बढ़ेगी। वन विभाग ने महिला मंगल दल, नवयुवक मंगल दल और स्वयं सहायता समूहों को पिरूल एकत्र करने और विक्रय करने के लिए प्रोत्साहित किया है। इससे न केवल जंगलों को आग से बचाया जा सकेगा, बल्कि स्थानीय लोगों की आमदनी भी बढ़ेगी। पिरूल से बने ब्रिकेट्स का उपयोग विभिन्न कार्यों में किया जा सकता है, जैसे कि चैकडेम बनाने में।
जिले के बागेश्वर रेंज के जौलकांडे वन परिसर, नक्षत्र वाटिका लकड़ियाथल, छतीना पौधालय, हर्बल गार्डन कठायतबाड़ा, वन परिसर कनगाड़छीना, झिरौली और वन रक्षक चौकी कनगाड़छीना में केंद्र स्थापित किए गए हैं। बैजनाथ रेंज के वन परिसर सिरकोट, वन परिसर कौसानी, वन परिसर महरपाली, वन परिसर पोखरी और बज्वाड़ में खरीद केंद्र बनाया है। गढ़खेत रेंज के वन परिसर जिंतोली, वन परिसर वज्यूला, वन परिसर गढ़खेत, वन परिसर जखेड़ा और कुलांऊ वन परिसर में पिरूल के एकत्रीकरण की व्यवस्था की गई है। कपकोट रेंज के जखेड़ी और कालीधार कंपाट संख्या दो में वन विभाग पिरूल की खरीद करेगा। धरमघर रेंज के देवतोली, सनीउडियार, वन परिसर दोफाड़, खेती, वन परिसर कांडा, लेटला, चौकोड़ी और बैड़ा में क्रय केंद्र स्थापित किए गए हैं।
जिलाधिकारी आकांक्षा कोंडे ने बताया की वनाग्नि को लेकर वन विभाग, तहसील प्रशासन और आपदा प्रबंधन टीम के साथ बैठक की है। हमारी क्विक रिस्पांस टीम (क्यूआरटी) भी पूरी तरह तैयार है। अलर्ट मिलते ही तहसील और वन विभाग की संयुक्त टीमें तुरंत घटनास्थल पर पहुंचती हैं। इसके अलावा, पिरुल संग्रहण के लिए स्वयं सहायता समूहों ने योजना तैयार की है। वन विभाग ने 200 टन पिरुल संग्रहण का लक्ष्य निर्धारित किया है, जिसमें प्रति किलोग्राम 10 रुपये महिलाओं को भुगतान किया जाएगा। लक्ष्य बढ़ाने के लिए राज्य सरकार को अनुरोध भी भेजा गया है। लक्ष्य बढ़ने पर पिरुल से विकेट्स और पेलेट्स बनाने जैसे आगे के कार्य संभव होंगे। वनाग्नि रोकथाम हो या पिरुल संग्रहण—दोनों मोर्चों पर प्रशासन पूरी तरह तैयार है।

