बागेश्वर की पहाड़ियों में महकता बदलाव: रीप परियोजना और सीएलएफ की मदद से धौलिनाग की 16 महिलाओं ने फूलों की खेती को बनाया आजीविका का जरिया
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| फूल की खेती |
बागेश्वर: विकासखंड कपकोट के अंतर्गत ग्राम सभा बासकुना के धौलिनाग गांव की महिलाओं ने अपनी मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति से यह साबित कर दिखाया है कि अगर सही दिशा में प्रयास किए जाएं, तो पहाड़ों की बंजर या पारंपरिक रूप से सीमित खेती भी समृद्धि का नया द्वार खोल सकती है। 'समृद्धि सीएलएफ, असों' से जुड़े धौलिनाग ग्राम संगठन की 16 महिलाओं ने 'रीप परियोजना' के सहयोग से फूलों की व्यावसायिक खेती शुरू कर एक प्रेरणादायक सफलता की कहानी लिखी है। आज इन महिलाओं के खेत सिर्फ फूल नहीं, बल्कि उनकी आर्थिक स्वतंत्रता और आत्मविश्वास की नई इबारत लिख रहे हैं।
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| फूल की खेती |
पारंपरिक खेती से हटकर अपनाया नवाचार
पहाड़ी क्षेत्रों में खेती की अपनी सीमाएं रही हैं, लेकिन इन महिलाओं ने लीक से हटकर कुछ नया करने की ठानी। मार्च के महीने में ग्राम संगठन की महिलाओं ने सामूहिक रूप से 'ग्लेडियोलस' (Gladiolus) के फूलों के कंद (बुल्ब्स) रोपने का साहसिक कदम उठाया। खेत तैयार करने से लेकर रोपण, नियमित सिंचाई, निराई-गुड़ाई और पौधों की देखरेख तक—सारा काम इन महिलाओं ने पूरी लगन और आपसी तालमेल के साथ किया। उनकी इस मेहनत का परिणाम जून माह के अंतिम सप्ताह में मिलना शुरू हुआ, जब उनके खेतों में ग्लेडियोलस के रंग-बिरंगे और सुंदर फूल खिल उठे। खेतों में लहराते इन फूलों ने न केवल गांव की सुंदरता बढ़ाई, बल्कि महिलाओं के चेहरों पर भी मुस्कान बिखेर दी।
उत्पादन से लेकर विपणन और मूल्य संवर्धन तक का सफर
इस सफलता की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि महिलाओं ने केवल फूल उगाने तक ही खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि 'वैल्यू एडिशन' (मूल्य संवर्धन) और लोकल मार्केटिंग पर भी पूरा जोर दिया। आकर्षक गुलदस्ते तैयार करना: ग्राम संगठन की महिलाओं ने फूलों से सुंदर और कलात्मक गुलदस्ते (Bouquets) बनाने का हुनर सीखा।
सरकारी और सामाजिक आयोजनों में मांग: अब ये गुलदस्ते और ताजे फूल न केवल स्थानीय बाजारों में बिक रहे हैं, बल्कि जनपद में आयोजित होने वाले विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों और सामाजिक आयोजनों की शान भी बढ़ा रहे हैं।
बाजार पर निर्भरता खत्म: ग्राम संगठन की अध्यक्ष श्रीमती सोनी मेहता बताती हैं कि पहले क्षेत्र को फूलों की जरूरत के लिए बाहरी बाजारों पर निर्भर रहना पड़ता था। लेकिन आज उनकी महिलाएं खुद स्थानीय स्तर पर उच्च गुणवत्ता वाले फूल और गुलदस्ते तैयार कर रही हैं, जिससे बाजार में उनकी डिमांड तेजी से बढ़ रही है।
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| खेती करती महिलाएं |
महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की मिसाल
रीप परियोजना के मार्गदर्शन ने इन ग्रामीण महिलाओं को पारंपरिक कृषि से निकालकर एक सफल सामूहिक उद्यमी (Collective Entrepreneur) के रूप में स्थापित कर दिया है। खेती से लेकर बिक्री और पैकेजिंग तक की पूरी कमान महिलाओं के अपने हाथों में है। इससे उनके भीतर व्यावसायिक समझ और नेतृत्व क्षमता का विकास हुआ है। जो महिलाएं कभी सीमित आय के दायरे में थीं, वे अब इस अतिरिक्त आय के जरिए अपने परिवारों को आर्थिक संबल दे रही हैं।
धौलिनाग की इन 16 महिलाओं का संदेश साफ है—यदि स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों का सही उपयोग किया जाए, सही मार्गदर्शन मिले और बाजार की मांग को समझकर सामूहिक प्रयास किए जाएं, तो ग्रामीण भारत में स्वरोजगार के बेहतरीन अवसर खुद-ब-खुद तैयार हो जाते हैं।
“खेतों में खिले ग्लेडियोलस के फूल अब केवल सुंदरता का प्रतीक नहीं हैं। ये धौलिनाग की महिलाओं की अटूट मेहनत, उनके बुलंद आत्मविश्वास और आर्थिक आत्मनिर्भरता की नई पहचान बन चुके हैं।”
भविष्य की राह
धौलिनाग ग्राम संगठन की यह सफलता सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं है, बल्कि यह पूरे कपकोट विकासखंड और बागेश्वर जनपद की महिलाओं के लिए एक रोल मॉडल बन गई है। यह पहल आने वाले समय में फूल उत्पादन के बड़े पैमाने पर विस्तार, बेहतर बाजार लिंकेज और अधिक मुनाफा कमाने की दिशा में एक मजबूत नींव साबित हो रही है। यह ग्रामीण आर्थिक विकास और महिला सशक्तिकरण का एक बेजोड़ दस्तावेज है।



