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जंगली जानवरों ने छीनी पारंपरिक खेती, तो बागेश्वर के बलवंत ने 'तिमूर' को बनाया अपनी किस्मत का सितारा

जंगली जानवरों ने छीनी पारंपरिक खेती, तो बागेश्वर के बलवंत ने 'तिमूर' को बनाया अपनी किस्मत का सितारा

बलवंत सिंह कार्की (तिमूरमैन)


​कपकोट (बागेश्वर): पहाड़ में जंगली जानवरों के आतंक से परेशान किसानों के लिए कपकोट के बलवंत सिंह कार्की एक नई उम्मीद बनकर उभरे हैं। रमाड़ी गांव निवासी बलवंत सिंह ने पारंपरिक खेती के बजाय 'तिमूर' (Timur) की व्यावसायिक खेती को अपनाकर न केवल खुद को आर्थिक रूप से मजबूत किया है, बल्कि दूसरों के लिए भी प्रेरणा बन गए हैं।


​असफलता से मिली सीख

बलवंत सिंह ने अपनी यात्रा की शुरुआत भंगीरा और तुलसी की खेती से की थी, लेकिन बाजार की कमी के कारण उन्हें सफलता नहीं मिली। हार न मानते हुए उन्होंने 2020-21 में हर्बल ह्यूमन संस्था और डाबर कंपनी के सहयोग से तिमूर के पौधे लगाए।


​आमदनी का नया जरिया

वर्तमान में उनके पास 800 से अधिक पौधे हैं, जिनमें से 500 पौधों ने फल देना शुरू कर दिया है। उन्होंने पहली उपज से ही 10,000 रुपये की कमाई की है। तिमूर की खास बात यह है कि इसका बीज का छिलका ₹2000 प्रति किलो तक बिकता है। इसके अलावा इसकी लकड़ी और पत्तियों की भी बाजार में काफी मांग है।
​बहुउपयोगी है तिमूर तिमूर का उपयोग आयुर्वेदिक दवाओं, दंत मंजन और मसालों में प्रमुखता से किया जाता है। इसकी बढ़ती मांग को देखते हुए बलवंत सिंह को उम्मीद है कि इस साल अक्टूबर तक एक क्विंटल से अधिक उत्पादन होगा।
​तकनीकी सहयोग और भविष्य बलवंत सिंह की मेहनत को देखते हुए सघन पौधा केंद्र, सेलाकुई (देहरादून) उन्हें तकनीकी जानकारी और प्रशिक्षण दे रहा है। तिमूर के साथ-साथ वे संतरा, आंवला, तेजपत्ता और पहाड़ी केला भी उगा रहे हैं, जिससे उनकी आय के स्रोत और बढ़ गए हैं।

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