यह अत्यंत दुखद समाचार है। उत्तराखंड के लोक संगीत जगत के लिए यह एक अपूरणीय क्षति है। दीवान कनवाल जी ने अपनी सुरीली आवाज से पहाड़ की संस्कृति को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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| Deewan Kanwal Singer |
उत्तराखंड के लोक संगीत प्रेमियों के लिए आज एक बेहद दुखद खबर सामने आई है। कुमाऊंनी लोक संगीत को अपनी सुरीली आवाज से सजाने वाले सुप्रसिद्ध गायक दीवान कनवाल का निधन हो गया है। उनके निधन की खबर मिलते ही समूचे प्रदेश और विशेषकर कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। दीवान कनवाल उत्तराखंड के उन गिने-चुने गायकों में से एक थे, जिन्होंने पारंपरिक लोक गीतों की मौलिकता को बनाए रखा। उनके गीतों में पहाड़ की मिट्टी की खुशबू, यहाँ का जनजीवन और पहाड़ का दर्द साफ झलकता था।
प्रमुख उपलब्धियां और योगदान
सदाबहार गीत: उन्होंने कई सुपरहिट कुमाऊंनी गीत दिए जो आज भी शादियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शान हैं।
सांस्कृतिक पहचान: कनवाल जी ने न केवल उत्तराखंड बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी प्रस्तुतियों के जरिए कुमाऊंनी संस्कृति का मान बढ़ाया।
नये कलाकारों के प्रेरणास्रोत: उन्होंने हमेशा नई पीढ़ी के गायकों को लोक संगीत से जुड़े रहने के लिए प्रेरित किया। मुख्यमंत्री सहित प्रदेश के कई राजनेताओं और लोक कलाकारों (जैसे प्रीतम भरतवाण, नरेंद्र सिंह नेगी आदि) ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है। सोशल मीडिया पर उनके प्रशंसकों की ओर से श्रद्धांजलि देने का तांता लगा हुआ है। प्रशंसकों का कहना है कि "उनकी आवाज हमेशा हमारे दिलों में गूंजती रहेगी।"
"दीवान कनवाल जी का जाना उत्तराखंडी लोक संगीत के एक युग का अंत है। उनकी कमी को कभी पूरा नहीं किया जा सकेगा।"
दीवान कनवाल जी के जीवन और उनके संगीत सफर को समेटता हुआ एक विस्तृत लेख यहाँ दिया गया है:
सुरों के शिखर पुरुष: दीवान कनवाल और उनका संगीतमय सफर
उत्तराखंड की धरती ने कई अनमोल रत्न दिए हैं, जिनमें से एक नाम दीवान कनवाल का है। वे केवल एक गायक नहीं, बल्कि कुमाऊंनी लोक कला और संस्कृति के चलते-फिरते संवाहक थे। उनका जाना एक ऐसे अध्याय का अंत है जिसने दशकों तक पहाड़ की वादियों को अपने सुरों से सराबोर रखा।
प्रारंभिक जीवन और संघर्ष
दीवान कनवाल का जन्म उत्तराखंड के पहाड़ी अंचल में हुआ था। बचपन से ही उन्हें लोक धुनों और पहाड़ के पारंपरिक वाद्य यंत्रों के प्रति गहरा लगाव था। उन्होंने उस दौर में गायकी शुरू की जब तकनीक इतनी विकसित नहीं थी, लेकिन उनकी आवाज़ में जो खनक थी, उसने उन्हें घर-घर में लोकप्रिय बना दिया।
संगीत की विशेषताएं: 'मिट्टी की आवाज़'
दीवान कनवाल की गायकी की कुछ खास बातें उन्हें अन्य कलाकारों से अलग खड़ा करती थीं। उन्होंने कभी भी आधुनिकता की दौड़ में लोक संगीत की पवित्रता से समझौता नहीं किया। उनके गीतों में केवल प्रेम ही नहीं, बल्कि पहाड़ का पलायन, खेती-बाड़ी, मेलों की रौनक और देवी-देवताओं की स्तुति प्रमुखता से होती थी। इतना बड़ा नाम होने के बावजूद वे जमीन से जुड़े रहे और हमेशा उभरते हुए कलाकारों की मदद के लिए तैयार रहते थे।
लोकप्रिय गीत और विरासत
उनके गाए हुए कई गीत आज भी कुमाऊं और गढ़वाल के हर घर में गूंजते हैं। चाहे शादी-ब्याह के शकुन गीत हों या मेलों में गूंजने वाले 'चांचरी' और 'झोड़ा', कनवाल जी ने हर विधा में अपनी छाप छोड़ी। दीवान कनवाल जी का निधन केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि उस मधुर आवाज़ का खामोश हो जाना है जो पहाड़ की पहचान थी। आज की युवा पीढ़ी के लिए वे एक ऐसी पाठशाला थे, जिनसे यह सीखा जा सकता था कि अपनी जड़ों से जुड़कर शिखर तक कैसे पहुँचा जाता है। उनका संगीत आने वाली कई पीढ़ियों तक उत्तराखंड की पहाड़ियों, गधेरों और बुग्यालों में गूंजता रहेगा। वे भले ही शारीरिक रूप से हमारे बीच न हों, लेकिन अपने कालजयी गीतों के माध्यम से वे हमेशा अमर रहेंगे। "जब तक पहाड़ रहेंगे, उनकी आवाज़ पहाड़ियों की गूँज में जीवित रहेगी।"ईश्वर उनकी दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करे और उनके परिवार को यह अपार दुख सहने की शक्ति दे। भावपूर्ण श्रद्धांजलि।

